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क्यों कम होते हैं होम लोन डीफॉल्टर्स

होम लोन लेकर अपना घर बनाने वालों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई है. होम लोन के आंकड़े देखें तो पता चलता है कि इसमें 30 से 35 एज ग्रुप के लोग सबसे ज्यादा हैं. यही नहीं दूसरे लोन्स की तरह इसमें डीफॉल्टर्स की संख्या भी काफी कम है. इस तरह के लोन में डीफॉल्टर्स की संख्या इतनी कम क्यों है, आइये जानते हैं.

लोन लेने वाले ऐसे कस्टमर्स की कमी नहीं जो उसे चुकाते नहीं, पर्सनल या फिर ऑटो लोन में ऐसे ग्राहकों की भरमार देखने को मिलती है. लेकिन जब बारी हाउसिंग लोन की आती है तो इसमें डीफॉल्टर्स की संख्या बेहद मामूली दिखती है. बावजूद इसके कि घर खरीदने के लिए होम लोन चंद बरस पहले महज 20 से 30 लाख रुपये तक ही दिया जाता था और बात 50 लाख रुपये तक पहुंच जाए तो ग्राहक की अर्जी को बैंक अपने हेड क्वार्टर भेज देते थे, उसे सैंक्शन कराने के लिए. लेकिन वक्त बदला और होम लोन की बढ़ती डिमांड के साथ बदली होम लोन के रूप में दी जाने वाली रकम. यही वजह है कि बैंक आज घर के नाम पर करोड़ों रुपए तक लोन पास करने में ज्यादा वक्त नहीं लगाते. करोड़ों की रकम उधार देते हुए क्या बैंकों को डर नहीं लगता? क्या उन्हें इसकी चिंता नहीं सताती कि ग्राहक अगर डीफाल्टर निकल गया तो लोन की रिकवरी कैसे होगी? वैसे भी अब तो रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया रिकवरी एंजेंट्स पर षिकंजा कसता ही जा रहा है. तो फिर आखिर होम लोन में डी-फॉलटर्स इतने कम क्यों हैं?

बैंक, दरअसल होम लोन के रूप में इतना बड़ा अमाउंट इसलिए पास कर देते हैं क्योंकि जिस चीज के बदले वो लोन दे रहे हैं वह उन्हीं के पास ही गिरवी होती है. बैंक जब तक दिए गए लोन की हर एक पाई नहीं वसूल लेता उसे प्रॉपर्टी के ओनर के नाम नहीं करता. यही नहीं होम लोन में बैंक के पास यह अधिकार भी होता है कि ग्राहक अगर लोन की किस्त न चुका पाए तो ऐसे में बैंक प्रॉपर्टी को नीलाम करके अपनी रकम की वसूली भी कर सकता है. हालांकि होम लोन के मामले में बैंकों के पास बहुत से अधिकार हैं जिन्हें वो वक्त पड़ने पर हथियार के रूप में इस्तेमाल कर सकता है, लेकिन इसकी नौबत बहुत कम मामलों में ही आती है.

अगर कोई कस्टमर लोन की री-पेमेंट बंद कर देता है तो बैंक खुद उससे कॉन्टेक्ट करके यह जानने की कोशिश करता है कि इसके पीछे आखिर वजह क्या है? अगर कस्टमर वित्तीय परेशानी में होता है और उसके पास कमाई के साधन नहीं होते तो ऐसे में बैंक ग्राहक से कुछ महीनों के लिए लोन की री-पेमेंट रोकने के लिए कह देते हैं और कस्टमर के पास पैसा आते ही री-पेमेंट फिर शुरू करा ली जाती है.

कई बार ऐसी स्थितियां भी बन जाती हैं कि कस्टमर लोन की री-पेमेंट करना ही नहीं चाहता. ऐसे में बैंक कस्टमर को कोर्ट का नोटिस भिजवा कर लोन की री-पेमेंट शुरू करने के लिए वक्त देता है. नोटिस के बावजूद री-पेमेंट न होने पर कोर्ट की मदद बैंक उस प्रॉपर्टी को टेक-ओवर कर लेता है और उसकी नीलामी करवा के अपनी रकम वसूल लेता है.

प्रॉपर्टी मामलों के जानकारों का कहना है कि घर किसी एक ग्राहक का नहीं बल्कि उसके पूरे परिवार का सपना होता है, जिसका सीधा संबंध उसके वर्तमान ही नहीं बल्कि भविष्य से भी होता है. ऐसे में होम लोन का डी-फॉल्टर बनके कोई भी कस्टमर उसे बिखरने नहीं देना चाहता.

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