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फ्री होल्ड या लीज होल्ड

प्रॉपटी खरीदते वक्त देख लें कि जमीन बिल्डर के नाम है या नहीं. जमीन फ्री होल्ड है या लीज होल्ड. पहले ही पता कर लें कि जमीन पर किसी सरकारी व्यक्ति, संस्था या चैरिटी ट्रस्ट का कब्जा तो नहीं. अगर जमीन किसी सरकारी संस्थान या एजेंसी के नाम है तो जानना जरूरी है कि बिल्डर ने कानूनी हक पाने के लिए सभी शर्ते पूरी की हैं या नहीं. कई बार लोग घर खरीदने के बाद उसमें रहने पहुंचते हैं तो उन्हें पता चलता है कि जमीन किसी और के नाम है. इसके बाद उस जमीन का मालिकाना हक पाने के लिए जेब से अच्छी खासी रकम ढीली हो जाती है. अगर जमीन पर किसी चैरिटेबल ट्रस्ट का अधिकार है तो बिल्डर को ट्रस्ट के आयुक्त से उस जमीन पर निर्माण के लिए अनुमति लेनी होती है.

इसके अलावा प्रॉपर्टी को बेचने से पहले भी चैरिटी कमिश्नर से अनुमति लेना जरूरी होता है. ऐसी जमीन पर हुए निर्माण में अपनी मेहनत की कमाई लगाने से पहले यह जानकारी जरूर लें कि बिल्डर ने ये सभी शर्ते पूरी की हैं या नहीं. किसी भी बिल्डिंग, अपार्टमेंट या मकान बनाने के लिए नगर निगम या संबंधित प्राधिकरण से मंजूरी लेना जरूरी होता है. इसके बाद ही बिल्डर निर्माण कार्य कर सकता है. बिल्डिंग की ऊंचाई के लिए भी अनुमति लेनी होती है. ज्यादातर मामलों में निगम बिल्डिंग की ऊंचाई और अवैध निर्माण को नजरअंदाज करता रहता है. मौके का फायदा उठाते हुए बिल्डर निर्धारित से ज्यादा ऊंची इमारत बना देते हैं.

किसी भी अपार्टमेंट या बिल्डिंग में फ्लैट खरीदने से पहले यह पता कर लें कि निगम ने बिल्डिंग प्लान मंजूर किया था या नहीं. यह भी पता करना चाहिए कि जो फ्लैट आप खरीद रहे हैं वह प्लान के मुताबिक बनाया गया है या उसमें तब्दीली की गई है. अगर तब्दीली की गई है तो उसकी अनुमति ली गई या नहीं. हर उस चीज पर नजर डालें जो गैरकानूनी हो सकती है. ऐसा न हो कि बिल्डर गैरकानूनी तरीके से निर्माण कर प्रॉपर्टी बेच जाए और बाद में निगम आपको ही दोषी ठहराए. प्राधिकरण किसी बिल्डिंग के निर्माण के लिए मंजूरी देते वक्त नामंजूरी सूचना पत्र भी देता है. इसमें बताया जाता है कि किन कारणों से बिल्डिंग प्लान को नामंजूर किया जा सकता है. यह पत्र एक साल के लिए जारी किया जाता है. यह जान लेना जरूरी है कि प्राधिकरण ने उस बिल्डर को तो कोई नामंजूरी पत्र नहीं भेजा था. अगर भेजा था तो प्राधिकरण ने पत्र में किन-किन कारणों का जिक्र किया. यह भी पता करना चाहिए कि बिल्डर को निर्माण कार्य शुरू करने की अनुमति मिली थी या नहीं. नामंजूरी सूचना पत्र की तरह यह भी एक साल के लिए वैध होता है. इस पत्र का भी समय-समय पर नवीनीकरण कराना पड़ता है.

इसके अलावा समझौता पत्र आपकी प्रॉपर्टी से जुड़ा ऐसा दस्तावेज है जिसको लेकर आप किसी तरह की लापरवाही नहीं बरतना चाहेंगे. इसमें दी गई हर बात को गौर से पढ़ना चाहिए. इस दस्तावेज में आपके फ्लैट के फ्लोर, फ्लैट नंबर, विंग, बिल्ट अप एरिया, भुगतान का तरीका और आपके गृह प्रवेश की तारीख तक हो सकती है. देख लें कि हर शर्त को ढंग से बताया गया हो. यह वही दस्तावेज है जिससे खरीदार और विक्रेता के बीच फ्लैट की बिकवाली और खरीदारी का समझौता होता है. जमीन, फ्लैट या घर की खरीदारी के लिए अगर पूरा स्टाम्प शुल्क जमा नहीं किया गया है तो सभी दस्तावेज पूरी तरह से अवैध माने जाएंगे. ऐसा होने पर आप पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है. प्रॉपर्टी के बाजार मूल्य या समझौता पत्र में दर्शाई गई राशि में जो ज्यादा हो उसके मुताबिक स्टाम्प शुल्क का भुगतान करना होता है. यह भुगतान समझौते के दौरान या उससे पहले कर देना चाहिए.

स्टाम्प ड्यूटी भुगतान के साथ ही समझौते का रजिस्ट्रेशन भी कराना होता है. यह सब-रजिस्ट्रार के साथ समझौते के चार महीने के भीतर हो जाना चाहिए. अगर इसमें किसी वजह से देरी होती है तो रजिस्ट्रार कुछ जुर्माना लगा कर चार महीने बाद भी पंजीयन कर सकता है. इस प्रक्रिया को किसी भी हालत में अनदेखा न करें. संबंधित विभाग इस प्रक्रिया को और आसान बनाने के लिए प्रक्रिया को कंप्यूटराइज्ड करने की कोशिश में हैं. अगर समझौते का पंजीयन नहीं कराया गया है तो सभी दस्तावेज अवैध माने जाएंगे. अगर ऐसा होता है तो आप भारी भरकम राशि देने के बाद भी परेशानी में पड़ सकते हैं.

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